क्यों नहीं होता

बाग़ में कलियाँ है ,फूल है , और वह चश्मा है ..
फिर मोहाब्बत का भी कभी कोई रंग क्यों नहीं होता ||

खंजर है ,ख्वाहिशे है और ख्वाबों में बस खून खराबा है ..
कभी ईन रंजिशों का भी कोई कत्लेआम क्यों नहीं होता ||

चाहत खुदा का एक नायाब तोहफा है ,पैगाम है ..
फीर हर दील एक खुली किताब क्यों नहीं होता ||

महफिलों में संगीत का वोह दौर जारी है ..
उफ़ ,ग़ज़लों का भी कभी कोई जिस्म क्यों नहीं होता ||

जिस्म ,जहाँ सब ब्बुस खुदा की इबादत है -“सोपान “..
फीर एक इंसान ,इंसान क्यों नहीं होता ||

जहाँ में कुछ भी नामुमकिन नहीं है ,क्या ????
फीर हर सवाल का जवाब क्यों नहीं होता ||

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