Chingaari yaaa Dhamaka

कुछ वक्त ही हुआ है उसे सोचते हुवे

तपती रेत मे नंगे पैर चलता सा लगता है |

कब से सुरों मैं खोज रहा है उसको

वोह सुर नही सुरों की परछाई मैं उलझा सा लगता है |

 

वोह सिहरन भी अभी तक याद है ‘नूर ’ ,

दिल के दरियां का दलदल सा हुआ लगता है |

 

पैर हिलते है , मचलते है ,थिरकते है

पर धडकनों का धुँआ सा उड़ा लगता है |

 

आगे का रास्ता धुएं मैं कहीं खो सा गया है ऐ – दोस्त,

यह शायद दिल के ही कहीं जलने का असर सा लगता है |

 

हर चाप पर मंजिल दूर जा रही है,

कही वोह उल्टे पैर बढ़ता सा लगता है |

 

डरना मत मैं तेरे साथ हूँ ऐसा कहाँ था उसने,

पर शरीर पहुँच से दूर कहीं काफूर हुवा सा लगता है |

 

ख़ुद का नाम भी अब तो लब पर आता नही दोस्तों,

वोह तो अब अपने आप से भी जुदा हुवा सा लगता है |

 

जिन्दगी पतझड़ के पत्तों का ढेर बन गयी है,

हर आवाज़ का आवाज का आग का सरसराना सा लगता है |

 

बस किस्सी तरह कहीं से आग लग जाएँ ईन पत्त्तों पर,

उसी किसी चिंगारी या धमाके के इन्तेजार मैं खोया सा लगता है ||

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