Chahta hoon

जिंदगी  तेज  चलती  कैंची   की  तरह , तार  तार  किये  जाती  थी  मेरी  सांसों   को ,

बस  अभी  अभी  सगुन  रूपी  सुकून  की  सुई  मिली  है  मुझको ….

अपने  साज  को ,दामन  को ,किताबों  को ,स्याही  को ,कलम  को  ,सांसों को  और  जिंदगी  को ;

थोडा  सीना  चाहता  हूँ  !!

फलक  तक  साथ  तेरे , निरंतर  चलना  चाहता  हूँ ..

“नूर ”(रौशनी ) बनकर  तुझमे  खो  जाना  चाहता  हूँ ..

समंदर  बनकर  तुझमे  समा  जाना  चाहता  हूँ ..

तुझे  साथ  लेकर  “स्वप्नीली ” आसमानों  में  उड़ना  चाहता  हूँ  !!