Good Times

खुल गए बंधन , खुल गए है अब सब परदे
रहा नहीं कतिपय , यहाँ कुछ दुर्गम वा अज्ञेय
चिर गए पाश , महालिन हुए सब निबंध प्रमेय
बस बचा है शान्ति , का तर महालय ध्येय
वासना , अग्नि , पोथी है अब प्राचीर प्राचीन
फिर तभी कभी क्यों नर को चाहिए , नित छिन्न भिन्न दुर्जेय ।

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